जब डोनाल्ड ट्रंप, पूर्व राष्ट्रपति of संयुक्त राज्य अमेरिका ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया, तो मध्य पूर्व की राजनीतिक धूल फिर से उड़ गई। उन्होंने कई मुस्लिम देशों से अपील की कि वे अब्रहम अकॉर्ड्स (Abraham Accords) पर हस्ताक्षर करें और इजरायल को मान्यता दें। लेकिन इस दावत में सबसे बड़ा 'नहीं' उसी देश ने कहा, जिसे अक्सर अमेरिका का 'भरोसेमंद मित्र' बताया जाता है—पाकिस्तान।
25 मई को हुई इस घटना ने न केवल वाशिंगटन और रियाद के बीच के गलियारों में हलचल मचा दी, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि मध्य पूर्व में शान्ति समझौतों का रास्ता कितना खतरनाक और जटिल है। ट्विस्ट यह है कि ट्रंप का दावा था कि ईरान के साथ संघर्ष समाप्त होने के बाद ये देश शामिल हो सकते हैं, लेकिन पाकिस्तान ने अपनी मौलिक विचारधारा को लेकर स्पष्ट स्थिति अपना ली।
अब्रहम अकॉर्ड्स: क्या है यह ऐतिहासिक समझौता?
सरल शब्दों में कहें तो, अब्रहम अकॉर्ड्स वह पुल है जो 1994 के बाद से इजरायल और अरब दुनिया के बीच टूटा हुआ था। अब्रहम अकॉर्ड्सवाशिंगटन डी.सी. पर 15 सितंबर 2020 को हस्ताक्षर किए गए थे। इस समझौते के तहत संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन ने इजरायल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने का फैसला किया। बाद में मोरक्को और सूडान भी इसमें शामिल हुए।
इसका नाम 'अब्रहम' इसलिए रखा गया क्योंकि यहूदी, ईसाई और मुस्लिम तीनों धर्मों में पैगंबर अब्राहम को सम्मानजनक स्थान प्राप्त है। उद्देश्य स्पष्ट था: व्यापार, तकनीक, पर्यटन और सुरक्षा में सहयोग बढ़ाकर क्षेत्र में स्थिरता लाना। विशेषज्ञों का मानना है कि यह 26 सालों में पहला बड़ा कदम था जिसने अरब-इजरायली द्वंद्व को कम करने का रास्ता बनाया।
ट्रंप का दबाव और 'अब्रहम-II' की योजना
लेकिन यही कहानी अभी खत्म नहीं हुई। हाल ही में, डोनाल्ड ट्रंप ने अपने प्लेटफॉर्म Truth Social पर एक पोस्ट के जरिए सऊदी अरब, कतर, तुर्की, मिस्र और जॉर्डन सहित अन्य मुस्लिम देशों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने एक कॉन्फ्रेंस कॉल में इन देशों के नेताओं से बातचीत की और उन्हें इजरायल के साथ संबंध सामान्य बनाने के लिए प्रेरित किया।
ट्रंप की तर्कशक्ति सरल थी: यदि ईरान के साथ तनाव कम हो जाता है, तो क्यों न पूरा क्षेत्र एक सुरक्षा ढांचे में आ जाए? विशेष रूप से, उनका मुख्य लक्ष्य सऊदी अरब और इजरायल के बीच औपचारिक समझौता करवाना है, जिसे वे 'अब्रहम अकॉर्ड्स-II' या एक बड़े क्षेत्रीय समझौते के रूप में देख रहे हैं। Axios की रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रयास मध्य पूर्व के भू-राजनीतिक नक्शे को अमेरिकी हितों के अनुकूल बदलने की उनकी रणनीति का हिस्सा है।
पाकिस्तान का स्पष्ट 'नहीं': विचारधारा बनाम राजनीति
और फिर आता है पाकिस्तान का मामला। जिसे अक्सर अमेरिका के इशारों पर चलने वाला बताया जाता है, उसने इस बार रेड लाइन खींच दी। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक स्पष्ट बयान देकर कहा कि "अब्रहम समझौते पर हस्ताक्षर करने का मतलब इजरायल को मान्यता देना है, जो पाकिस्तान की मौलिक विचारधारा के खिलाफ है।"
यह कोई छोटी बात नहीं है। पाकिस्तान की स्थापना ही मुस्लिम अधिकारों और फिलिस्तीन के मुद्दे पर आधारित रही है। वहां की जनता और राजनीतिक वर्ग दोनों ही इजरायल को मान्यता देने को धार्मिक और राष्ट्रीय स्वार्थों के विरुद्ध मानते हैं। ख्वाजा आसिफ के बयान ने यह संकेत दिया कि चाहे अमेरिकी दबाव कितना भी हो, पाकिस्तान इस मामले में पीछे नहीं हटेगा। यह निर्णय पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति और उसके नाटो के साथ द्विविध संबंधों के बीच एक संवेदनशील संतुलन दिखाता है।
विश्लेषण: क्या यह समझौता काम करेगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह प्रयास दोहरा खतरा है। एक तरफ जहां UAE और बहरीन जैसे देश आर्थिक लाभ के लिए इस समझौते में शामिल हो चुके हैं, वहीं सऊदी अरब जैसे बड़े खिलाड़ी फिलिस्तीन के मुद्दे को हल किए बिना इजरायल के साथ पूर्ण संबंध स्थापित करने को तैयार नहीं दिख रहे। पाकिस्तान का इनकार यह साबित करता है कि सभी मुस्लिम देश एक समान नहीं हैं।
एक ओर जहां तकनीकी और आर्थिक सहयोग का वादा किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर फिलिस्तीनियों के अधिकारों की उपेक्षा का आरोप लगाया जा रहा है। अगर ट्रंप की योजना सफल होती है, तो मध्य पूर्व में एक नई सुरक्षा गठबंधन का जन्म हो सकता है। लेकिन अगर पाकिस्तान, तुर्की और अन्य देश इससे दूर रहते हैं, तो यह समझौता अधूरा रह जाएगा।
आगे क्या होगा?
अगले कुछ महीनों में हम देखेंगे कि सऊदी अरब कैसा रुख अपनाता है। अगर रियाद भी इस समझौते में शामिल होता है, तो मध्य पूर्व की राजनीति में बड़ा बदलाव आएगा। लेकिन पाकिस्तान का 'नहीं' यह संकेत देता है कि विचारधारात्मक बाधाएं अभी भी मजबूत हैं। ट्रंप को अब यह साबित करना होगा कि केवल दबाव और आर्थिक लालच से राजनीतिक बदलाव संभव है।
Frequently Asked Questions
अब्रहम अकॉर्ड्स到底是什么?
अब्रहम अकॉर्ड्स 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और कुछ अरब देशों (UAE, बहरीन, मोरक्को, सूडान) के बीच किए गए समझौते हैं। इनका उद्देश्य राजनयिक संबंध सामान्य बनाना, व्यापार बढ़ाना और क्षेत्रीय सुरक्षा में सहयोग करना है।
पाकिस्तान अब्रहम अकॉर्ड्स में क्यों शामिल नहीं हो रहा?
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने स्पष्ट किया कि इस समझौते पर हस्ताक्षर करने का मतलब इजरायल को मान्यता देना है, जो पाकिस्तान की मौलिक विचारधारा और फिलिस्तीन के प्रति समर्थन के विरुद्ध है।
डोनाल्ड ट्रंप इस समझौते में किसका दबाव डाल रहे हैं?
ट्रंप ने सऊदी अरब, कतर, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और पाकिस्तान सहित कई मुस्लिम देशों से अपील की है कि वे ईरान के साथ तनाव कम होने के बाद इस समझौते में शामिल हों। उनका मुख्य लक्ष्य सऊदी अरब-इजरायल समझौता करवाना है।
क्या इस समझौते से मध्य पूर्व में शांति आएगी?
विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता आर्थिक और सुरक्षा सहयोग बढ़ा सकता है, लेकिन फिलिस्तीन के मुद्दे के बिना पूर्ण शांति संभव नहीं है। पाकिस्तान और तुर्की जैसे देशों का विरोध यह दर्शाता है कि विचारधारात्मक बाधाएं अभी भी मौजूद हैं।
अब्रहम अकॉर्ड्स-II क्या है?
अब्रहम अकॉर्ड्स-II एक प्रस्तावित विस्तार है जिसमें सऊदी अरब और अन्य बड़े अरब देशों को इजरायल के साथ संबंध सामान्य बनाने के लिए शामिल किया जाना है। इसे मध्य पूर्व के लिए एक बड़े सुरक्षा और आर्थीय गठबंधन के रूप में देखा जा रहा है।