जब डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान पर नई प्रतिबंधों की चेतावनी दी, तो बाजार ने इसे गंभीरता से ले लिया। ब्रेंट क्रूड की कीमतों में हुई यह तेजी सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, यह उन सभी लोगों के लिए एक चिंता का विषय बन गया है जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में पेट्रोल-डीज़ल के बढ़ते दामों से जूझ रहे हैं।
गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों ने $120 प्रति बैरल का心理िक स्तर पार कर लिया। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, यह कीमतें क्षण भर के लिए $123 प्रति बैरल तक भी पहुंच गईं। यह वह स्तर है जिसका हम पिछले चार सालों में, यानी 2022 के बाद से शायद ही कभी साक्षी बने हों। वहीं, अमेरिकी बेचमार्क WTI क्रूड भी $108 प्रति बैरल के ऊपर कारोबार कर रहा था।
बाजार में उथल-पुथल का कारण क्या है?
इस उछाल का सीधा संबंध मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनैतिक तनाव से है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती दुश्मनी और इज़राइल-लेबनान संघर्ष ने निवेशकों के मन में खौफ फैला दिया है। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरानी तेल निर्यात पर लंबी नाकाबंदी (blockade) की धमकी ने बाजार में और भी हलचल मचा दी।
यहाँ बात सिर्फ राजनीति की नहीं है, बल्कि आपूर्ति की है। दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस की आपूर्ति हॉर्मूज़ की खाड़ी के जरिए होती है। जब इस रास्ते पर खतरे की घंटी बजती है, तो बाजार तुरंत प्रतिक्रिया देता है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि मार्च महीने में ही कच्चे तेल की कीमत में 60 प्रतिशत की तेज वृद्धि दर्ज की गई, जो 1988 के बाद से किसी महीने में सबसे ज्यादा उछाल है।
भारत पर क्या असर पड़ेगा?
भारत के लिए यह स्थिति चिंताजनक है। हम देश अपनी कुल तेल आवश्यकता का एक बड़ा हिस्सा आयात करते हैं। जब वैश्विक कीमतें बढ़ती हैं, तो हमारा आयात बिल फूल जाता है। न्यूजमोबाइल की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रुपए पर भी दबाव पड़ सकता है। डॉलर के मुकाबले रुपया 94.90 से 94.95 के स्तर पर खुल सकता है, जो मजबूत डॉलर और महंगे तेल के प्रभाव को दर्शाता है।
विमानन, लॉजिस्टिक्स, पेंट्स और केमिकल्स जैसे उद्योगों को सबसे ज्यादा झटका लगा। इन क्षेत्रों में उत्पादन लागत बढ़ने से उपभोक्ताओं तक यह असर जल्दी पहुँच सकता है। GIFT Nifty में लगभग 0.30 प्रतिशत की गिरावट देखी गई, जो भारतीय शेयर बाजार की कमजोर शुरुआत का संकेत थी।
विश्लेषकों की राय: अब क्या होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ब्रेंट क्रूड $120 प्रति बैरल के ऊपर बना रहता है, तो वैश्विक शेयर बाजारों में अस्थिरता लंबे समय तक जारी रह सकती है। लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है। जब भी युद्धविराम या शांति की दिशा में कोई ठोस संकेत मिलता है, कीमतें तेजी से गिरती हैं।
उदाहरण के लिए, जब सीजफायर (ceasefire) की घोषणा हुई थी, तो कच्चे तेल की कीमतों में 17 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आई थी। उस समय ब्रेंट क्रूड $91.88 प्रति बैरल तक गिर गया था। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि ईरान युद्ध दो से तीन हफ्तों में खत्म हो सकता है, जिसके बाद कीमतों में 4 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई थी।
Frequently Asked Questions
कच्चे तेल की कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?
मुख्य कारण मध्य पूर्व में बढ़ता सैन्य तनाव, विशेष रूप से अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष है। इसके अलावा, ईरानी बंदरगाहों पर संभावित नाकाबंदी और हॉर्मूज़ की खाड़ी से तेल की आपूर्ति में बाधा की चिंता ने बाजार में डर फैला दिया है।
क्या यह कीमतें भारत में पेट्रोल-डीज़ल के दामों को प्रभावित करेंगी?
हां, संभावना है। भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल महंगा होता है, तो कंपनियों को आयात करने में अधिक खर्च करना पड़ता है, जिससे अंततः पंप पर पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें बढ़ सकती हैं।
ब्रेंट क्रूड और WTI क्रूड में क्या अंतर है?
ब्रेंट क्रूड यूरोप, अफ्रीका और मध्य पूर्व से आने वाले तेल का बेचमार्क है, जबकि WTI (वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट) मुख्य रूप से उत्तरी अमेरिका के तेल को दर्शाता है। दोनों की कीमतें अक्सर एक-दूसरे के साथ चलती हैं, लेकिन भौगोलिक कारकों के कारण थोड़ा अंतर रहता है।
क्या कीमतें फिर से गिर सकती हैं?
हां, इतिहास दिखाता है कि जब भी तनाव कम होता है या युद्धविराम की बात होती है, कीमतें तेजी से गिरती हैं। हाल ही में सीजफायर की खबरों पर कीमतों में 17 प्रतिशत की गिरावट आई थी। इसलिए राजनीतिक विकास ही कीमतों की दिशा तय करेंगे।